सुरेश कोहलीसौजन्य: जनसत्ता
इस बात को काफी समय नहीं हुआ है जब फिल्म निर्माता यह नहीं जानते थे कि वे अपनी फिल्म के हिट या फ्लॉप होने के बाद बचे हुए पोस्टरों का क्या करें। इन्हें अक्सर अलमारियों, रसोईघर, नहानघर या बड़े निर्माताओं के गोदामों में अक्सर रख दिया जाता था। वहां पड़े-पड़े उनमें दीमक लग जाती और अंतत: उन्हें या तो रद्दी में बेच दिया जाता या कचरे में फेंक दिया जाता। लेकिन बीते दिनों के यही दुर्लभ पोस्टर अब सोने के भाव बिक रहे हैं। इनका मोल जिस तह अचानक बढ़ा है, उसे देख दादी मां की यह सीख बरबस याद आ जाती है: नया नौ दिन पुराना सौ दिन। कभी जिन पोस्टरों की कोई कद्र नहीं थी, वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में लाखों में बिक रहे हैं। जाहिर है, जिन लोगों ने शौकिया तौर पर इनका संग्रह किया था, वे अब इनसे चांदी काट रहे हैं। मनाफे का यह धंधा उन्हें खूब रास आने लगा है। कुछ लोग इनका संग्रह बड़ गर्व महसूत करते हैं तो कुछ इन्हें अपनी कमाई का जरिया बना रहे हैं।
एम ओसाजा उनमें से हैं जिन्होंने शौकिया तौर पर दुर्लभ पोस्टरों का संग्रह किया है। लखनऊ में अपने कॉलेज के दिनों से ही वे प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं के लिए 1996 में मुंबई आने पहले तक फिल्मों पर लिखते रहे हैं। जावेद अख्तर उनके शुरुआती मित्रों में हैं। जावेद ने ही उन्हें महेश भट्ट और अमित खन्ना से मिलाया था, जिनकी उस समय प्लस चैनलों पर धूम मची हुई थी। अमित खन्ना के देश के पहले अंग्रेजी धारावाहिक 'अ माउथफुल ऑफ स्काई' के निर्माण के दौरान ओसाजा ने इस काम को तेजी से सीखा औऱ इस क्षेत्र में अपनी खास पहचान बनाई। इसके बाद वे आगे बढ़ते ही गये।
ओसाजा के पास जो संग्रह है, उसे देखकर किसी को भी रश्क होगा। इनके पास पांच हजार से भी अधिक हाथ से चित्रित पोस्टर हैं। उनके इस शौक ने तब जन्म लिया था जब सत्तर के दशक में पर्दे पर अमिताभ का जादू छाने लगा था। वे कहते हैं: 'मैं उनके पोस्टर्स और फिल्मों से जुडी अन्य सामग्री 1982 से इकट्ठा करने लगा था। धीरे-धीरे मेरे संग्रह का विस्तार होता गया और मैं सभी प्रकार की क्लासिक्स उसमें जोड़ता चला गया। मुंबई आने के बाद तो मेरा यह शौक और परवान चढ़ा और आज मेरे संग्रह में एलपी रेकॉर्ड्स, गीत और फिल्मों की प्रचार सामग्री लॉबी और शो कार्ड्स, श्वेत श्याम और रंगीन छायाचित्र, पारदर्शियां और पत्र-पत्रिकाओं के आवरण जैसी दुर्लभ चीजें हैं। मेरे पास तीन हजार से भी अधिक एलपी रिकॉर्ड बेहतर स्थिति में है। संग्रह में 1931 से लेकर आज तक फिल्मों से जुड़ी कई बेशकीमती सामग्री है। लेकिन इस संग्रह में मैं जिसे सबसे नायाब और मूल्यवान मानता हूं, वह है दिवाकर किरकिरे का अमिताभ बच्चन की लाल रंग की कमीज पहने खड़ी हुई मुद्रा वाला पोस्टर।'बच्चन के लिए ओसाजा का यह जुनून खासा रंग लाया। एक दिन अमिताभ से उनकी श्रीनगर के विजय शो प्रोग्राम के दौरान मुलाकात हो गई और धीरे-धीरे उनके बीच एक खास रिश्ता कायम हो गया।
अब ओसाजा 'बच्चन्स' शीर्षक से एक पुस्तक लिख रहे हैं। उन्होंने यह पुस्तक अमिताभ के पिता हरिवंशराय से शुरू की है, जब वे इलाहाबाद के श्रीवास्तव से बच्चन बने थे। जाहिर है, पुस्तक लिखने से उन्हें बिग बी का सहयोग मिल रहा है और इस वर्ष उनके जन्मदिन के मौके पर इसके सामने आने की उम्मीद है। देश का सबसे कम उम्र का यह फिल्म इतिहासकार ओसाजा 'बच्चन्स' के अलावा सिनेमा पर और पुस्तकें भी लिख रहा है। इनमें सबसे पहले 'बॉलीवुड इन पोस्टर्स' के शाया होने की संभावना है।

1 comments:
सही प्रयास है। अखबार ना पढ़ पाएं तो कम से कम यहां तो मिल गया पढ़ने को।
धन्यवाद दोस्त।
- पंकज शुक्ल
http://thenewsididnotdo.blogspot.com/
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